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महोदय, हमारे बीच आज पाकिस्तान के अध्यक्ष की उपस्थिति इस सुखद परिवर्तन का प्रमाण है। व्यक्तिगत असुविधा के बावजूद उन्होंने गणराज्य दिवस समारोह देखने के लिए हमारा निमंत्रण स्वीकार किया और वे यहां पधारे हैं। विदेशों के साथ महत्वपूर्ण संपर्क की दिशा में यह वर्ष चिरस्मरणीय रहेगा। इस वर्ष बाहर से कई एक सम्माननीय महानुभाव हमारे देश में आए। उनमें यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति, चीनी लोकराज्य के प्रधानमंत्री, श्रीलंका के प्रधानमंत्री और इंडोनीशिया के प्रधानमंत्री का मैं विशेष उल्लेख करना चाहूंगा। इन महान नेताओ का स्वागत करना हमारा सौभाग्य था। रूस, चीन तथा अफगानिस्तान के सांस्कृतिक शिष्टमंडल भी इस वर्ष हमारे देश में आए। इन शिष्टमंडलों को भारत में बहुत लोकप्रियता मिली। ऐसे आगमनों और राष्ट्रों में सांस्कृतिक शिष्टमंडलों के आदान-प्रदान की उपादेयता निश्चय ही बहुत अधिक है।संयुक्त राष्ट्र संघ के आदर्शों में हमारी आस्था यथापूर्ण स्थिर है। फिर भी, मेरे विचार से विभिन्न भूखंडों के राष्ट्रों द्वारा सामान्य समस्याओं पर विचार करने के लिए पारस्परिक विचार-विमर्श, उन महान विश्व संगठन के उद्देश्य अथवा आदर्शों के प्रतिकूल नहीं। एशिया और अफ्रिका के राष्ट्र इंडोनीशिया में अपना सम्मेलन कर रहे हैं, जिसमें निजी समस्याओं पर विचार करेंगे। मुझे बहुत प्रसन्नता है कि बोगोर सम्मेलन और प्रस्तावित जकार्ता सम्मेलन का आयोजन करने में भारत कुछ सहायता कर सका है। यह सब कार्य निश्चय ही बहुत बड़े हैं, इनसे हमें आगे बढ़ने के लिए दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वासी बने रहने की प्रेरणा मिलती है। यह उस नए युग का आरंभ मात्र है जिस भू पर उतरने की हम प्रतिज्ञा कर चुके हैं। जो महान कार्य हमने अपने उपर लिए हैं, उन्हें संपन्न करने के लिए भारत का प्रत्येक नागरिक की सदभावना, सहयोग तथा सहायता की अपेक्षा है। यह अब प्रत्यक्ष होता होता जा रहा है कि लोगों में आशा और आत्मविश्वास की कमी नहीं और भारत के भविष्य में उन्हें पूर्ण विश्वास है। ये शुभ लक्षण हैं। अपने पिछड़े हुए और दलित भाइयों से दो शब्द कह कर मैं इस संदेश को समाप्त करता हूं। हम अपनी प्रतिज्ञाओं से मार्गदर्शन और उन उच्च आदर्शों से उत्प्रेरित हों, जिनका सदियों से भारत ने आदर किया है और जिनका फिर से स्मरण कराने के लिए महात्मा गांधी ने इतना गंभीर प्रयत्न किया, जो भारत में सच्चा कल्याणकारी राज्य स्थापित करने के लिए कटिबद्ध हैं, ऐसा कल्याणकारी राज्य बनाएंगे जिसमें प्रत्येक नागरिक को न केवल समान अधिकार और समान अवसर मिलेगा, बल्कि वह अपने देश के प्रति कर्तव्य का भी स्वेच्छा से पालन करेगा। मेरी आज यह प्रार्थना है कि हमारा यह आदर्श ध्रुव तारे के समान हमारे पथ प्रदर्शन के लिए हमें प्रेरणा देने के लिए सदा हमारे सामने रहेगा। मैंने यह प्रयत्न किया है कि संसद के इस सत्र में जो काम आपके सामने आएंगे उनमें से कुछ आपको बता दूं। मुझे आशा है कि आपका परिश्रम हमारे देश के कल्याण के लिए सफल होगा और भारत गणराज्य की यह नर्इ संसद मैत्रीपूर्ण सहयोग का एक उदाहरण उपस्थित करेगी। अध्यक्ष महोदय, प्रारंभिक दौर के भारतीय राष्ट्रवादी नेताओं का विश्वास था कि राजनीतिक मुक्ति के लिए सीधे संघर्ष का कार्यक्रम इतिहास की कार्यसूची में अभी नहीं था। कार्यसूची में था, राष्ट्रवादी भावना का पैदा किया जाना, उसे गहन करना, राष्ट्रवादी राजनीति के दायरे में भारतीय जनता में अधिक संख्या में लाना और राजनीति और राजनीतिक संघर्ष के लिए प्रशिक्षित करना। इस दृष्टि से पहला महत्वपूर्ण कार्य यह था राजनीतिक प्रश्नों में जनता की रुची उत्पन्न करना और देश में जनमत का संगठन। दूसरा, देशव्यापी स्तर पर लोकप्रिय मॉंगों को व्यवस्थित रूप में रखना ताकि विकसित होता हुआ जनमत सारे देश का ध्यान आकर्षित कर सके। पहले चरण में, सबसे महत्वपूर्ण कार्य था राजनीतिक दृष्टि से प्रबुद्ध देशवासियों और राजनीतिक नेताओं कार्यकर्ताओं में राष्ट्रीय एकता की भावना का जागरण। प्रारंभिक दौर के राष्ट्रवादी इस तथ्य के प्रति पूर्णतया सतर्क थे कि भारत निर्माण की प्रक्रिया में है। भारतीय राष्ट्रीयता धीरे-धीरे अस्तित्व में आ रही थी, अत: यह मानकर नहीं चला जा सकता था कि इसकी सिद्धी हो गई है। राजनीतिक नेताओं को क्षेत्र, जाति और धर्म के पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर राष्ट्रीय एकता की भावना को गहराने और विकसित करने का काम निरंतर और अनिवार्य रूप में करना ही था। उदाहरण के लिए, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने आशा की कि वह देश के विभिन्न भागों के सक्रिय राष्ट्रवादियों के बीच मित्रता के संबंधों को प्रगाढ़ करने की दिशा में एक छोटी-सी शुरुआत करेगी। प्रारंभिक दौर के राष्ट्रवादियों ने अपनी आर्थिक और राजनीतिक मांगों को इस दृष्टि से तैयार किया गया था ताकि वे भारतीय जनता को एक समान आर्थिक और राजनीतिक कार्यक्रम के आधार पर संगठनबद्ध कर सकें।संभवतया प्रारंभिक दौर के राष्ट्रवादियों को सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक काम उनका साम्राज्यवाद का आर्थिक विवेचन था। उन्होंने उस वक्त के आर्थिक शोषण के तीनों रूपों यानी व्यापार, उद्योग और वित्त पर नजर रखी। वे अच्छी तरह समझ गए कि ब्रिटेन के आर्थिक साम्राज्यवाद के पीछे सार दृष्टि भारतीय अर्थव्यवस्था को ब्रितानी अर्थव्यवस्था के अधीन रखना है। उन्होंने औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के मूलभूत लक्षणों को विकसित करने के ब्रितानी प्रयत्न का जोरदार विरोध किया। उन्होंने उपनिवेशवादी ढांचे पर खड़ी सरकार की प्राय: सभी आर्थिक नीतियों के विरोध में प्रभावशाली आंदोलन आयोजित किए। अलावा इसके, उन्होंने आर्थिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में यह पैरवी की कि भारत पर ब्रिटेन की आर्थिक अधीनस्थता कम की जाए, जहां तक कि उसे समाप्त कर दिया जाए। इस दौर के राष्ट्रवादियों ने भारत की बढ़ती हुई गरीबी की चर्चा अपने लेखों और भाषणों में निरंतर की और उसे ब्रिटेन द्वारा भारत के आर्थिक शोषण से जोड़ा। दादाभाई नौरोजी ने इशारा किया कि भारतवासी मात्र परजीवी दास थे। वे अमरीकी गुलामों से भी बदतर थे क्योंकि उनकी देखरेख उन अमेरिकी मालिकों द्वारा की जाती थी जिनकी वे संपत्ति थे। उन्होंने घोषणा की कि ब्रितानी शासन, पूरी तरह देश को नष्ट कर रहा है।
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